सांसदों और विधायकों का आम जनता के प्रति जवाबदेही का मैग्नाकार्टा »

भारत में एक बार सरकार बन जाने के बाद सत्तारूढ़ पार्टियों का आम जनता से संवाद एकतरफा हो जाता है। सरकारें कितना भी अलोकतांत्रिक और निरंकुशतापूर्ण ढंग से कार्य क्यों न करें, लेकिन सरकारों के ‘आप्त बचन’ सुनने के लिए आम जनता अभिशप्त जैसे होती है। सरकारें इतना शक्तिशाली होती हैं कि व्यक्ति विशेष अथवा सामाजिक वर्गों की आवाजें शासन एवं प्रशासन की शक्ति द्वारा कुचल दी जाती हैं। पीपुल्स मूवमेन्ट आॅफ इण्डिया (पी0एम0आई0) ने सरकारों के गठन की प्रक्रिया की जो पद्धति देश के सामने रखा है उसका उल्लेख घांेषणा-पत्र के शुरूआत में ही कर दिया गया है। अब मैं आगे स्वस्थ एवं प्रगतिशील लोकतंत्र के लिए एक विजन का जिक्र करना चाहता हूँ जिससे कि किसी भी परिस्थिति में राज्य सरकारें निरंकुश तो हो ही नहीं पायेंगी, बल्कि उनको बहुत ही बैज्ञानिक तरीके से जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकेगा। उदाहरण स्वरूप भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे में सबसे प्राथमिक इकाई ग्राम पंचायत होती है यदि पूरे प्रदेश के प्रत्येक ग्राम प्रधान और बी0डी0सी0 सदस्य को सी0यू0जी0 नम्बर उपलब्ध करा दिया जाय और विधानसभाओं में होने वाले नियमित 3 सेशन के पहले ग्राम प्रधानों और बी0डी0सी0 सदस्यों से विभिन्न समस्याओं के सन्दर्भ मंें उनकी सहमति अथवा असहमति के बारे में एस0एम0एस0 द्वारा राय ली जाय। तत्पश्चात् इसके अनुसार ही प्रदेश सरकार आगे की कार्यसंस्कृति डेवलप करे। आजाद भारत में चुनावी प्रक्रिया 68 साल का प्रवाह तय करते-करते आज इस मुकाम पर पहुँच गयी है कि सांसद और विधायक के प्रत्याशी केवल चुनावों के समय जनता के सम्पर्क में आते हैं और चुनाव जीतने के बाद लगभग पूरे कार्यकाल के दौरान अपने क्षेत्र के वोटर्स के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं। आज हमारी संसद और विधानसभाएं अरबपतियों और करोड़पतियों से भरी होने के कारण ‘हाऊस आफ लार्ड’ की तरह दिखाई पड़ती हैं। सांसद अथवा विधायक अपने क्षेत्र की जनता से पूरे कार्यकाल के दौरान जुड़े रहें, उनके प्रति संवेदनशील रहे, उनके प्रति जवाबदेह रहें इसके लिए यह किया जा सकता है कि सांसद अथवा विधायक सदनों के सत्र चलने के पहले अपने-अपने क्षेत्र के ग्राम प्रधानों और ब्लाक पंचायत समिति के सदस्यों की मीटिंग बुलाकर पूँछे कि हमको सदन में कौन से सवाल पूँछने चाहिए अर्थात इस बार सदन में चलने वाली बहस में हमारे क्षेत्र की कौन सी समस्या उठाना सबसे ज्यादा जरूरी है और इसी तरह सांसद और विधायक इन ग्राम प्रधानों और ब्लाक पंचायत समिति के सदस्यों से आगामी सत्र में क्षेत्र विशेष की समस्याओं के प्रश्नों से सम्बन्धित राय लेने आये तो उन्हें इनके सामने विगत सत्र में पूँछे गये सवालों का विवरण प्रस्तुत करना चाहिए। वर्तमान समय में तकनीक बहुत उन्नत हो गयी है। यदि विभिन्न समस्याओं को लेकर प्रदेश विकास सूचकांक बनाया जाय जिसमें ला एण्ड आर्डर, शिक्षा, सिंचाई, स्वास्थ्य, क्राइम, बाढ़, सूखा इत्यादि समस्याओं का भारांक उस इण्डेक्स में निर्धारित किया जाय। वर्ष के प्रत्येक माह में ग्राम प्रधानों और बी0डी0सी0 से समस्याओं के संदर्भ मंें एस0एम0एस0 द्वारा राय ली जाय। ऐसा कानून बनाया जाय कि यदि पूरे प्रदेश के 25 प्रतिशत ग्राम प्रधान और बी0डी0सी0 विधानसभा के किसी सत्र से पहले एस0एम0एस0 के द्वारा यह राय दें कि प्रदेश की कानून व्यवस्था अच्छी नहीं है तो इस मुद्दे पर सरकार को श्वेतपत्र जारी करके प्रदेश की जनता को तथ्यों सहित यह स्पष्टीकरण देना होगा कि किन-किन कारणों से कानून और व्यवस्था की स्थिति नहीं सुधर रही है। अभी तो सरकारें प्रत्येक स्थिति में कानून और व्यवस्था को अच्छा ही बताकर अपनी पीठ ठोंकती रहती हैं। फिर चाहे कानून व्यवस्था की स्थिति कितनी ही खराब क्यों न हो। इसी तरह से यदि प्रदेश भर के 51 प्रतिशत या उससे ज्यादा ग्राम प्रधानों और बी0डी0सी0 यह राय व्यक्त करते हैं कि प्रदेश की कानून व्यवस्था ठीक नहीं है तो उस परिस्थिति में राज्य सरकारों के लिए यह नियम बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए कि ऐसी परिस्थिति में राज्य विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुलाया जाय, जिसमें सरकार इस बात की चर्चा कराकर समाधान निकाले जिससे कि कानून व्यवस्था को लेकर जनता में अधिक विश्वास विकसित हो सके। इसी तरह से यदि सिंचाई की समस्या को लेकर प्रदेश के यदि 25 प्रतिशत ग्राम प्रधान एवं बी0डी0सी0 अपने सी0यू0जी0 नम्बर द्वारा एस0एम0एस0 करके यह राय दें कि प्रदेश सरकार द्वारा की गई सिंचाई की व्यवस्था संतोषप्रद नहीं है तो कानूनी रूप से प्रदेश सरकारों के लिए यह बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए कि प्रदेश सरकार तुरन्त श्वेतपत्र जारी करके तथ्यों सहित प्रदेश की जनता को यह बताये कि सिंचाई की समस्या के समाधान हेतु प्रदेश सरकार ने क्या-क्या उपाय किये हैं? यदि ग्राम प्रधानों और बी0डी0सी0 के एस0एम0एस0 का प्रतिशत सिंचाई के संदर्भ में 51 प्रतिशत होता है तो उपरोक्त की ही तरह यहाँ भी इस समस्या के निराकरण हेतु सरकार को सदन का विशेष सत्र बुलाना सरकार के लिए बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए। सवाल यह उठ सकता है कि किस-किस समस्या के लिए विधानसभाओं के विशेष अधिवेशन बुलाये जायेंगे। इस दुविधा के निराकरण के लिए समस्याओं का एक सूचकांक बना लेना चाहिए। जिस तरह से विभिन्न जिन्सों और उपभोक्ता वस्तुओं को लेकर केन्द्र सरकार मँहगाई सूचकांक बनाती हैं उसी तरह से प्रदेश भर की विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित समस्याओं को लेकर राज्य समस्या सूचकांक क्यों नहीं बनाया जा सकता है? जिससे कि जनता समय-समय पर वैज्ञानिक और निरपेक्ष तरीके से यह जान सके कि सरकारें अच्छा काम कर रहीं हैं अथवा नहीं। यदि सूचकांक सामान्य से ऊपर चला जाय तो सदनों का विशेष अधिवेशन बुलाया जाना चाहिए, नहीं तो केवल श्वेतपत्र जारी करके राज्य सरकारें अपना स्टैण्ड जनता के सामने रख सकती हैं। जिस तरह से राज्य सरकारें निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता की सारी सीमाएं तोड़ती हुई दिखती हैं उसी तरह से विधायक और सांसद भी अपने निर्वाचित हो जाने के बाद स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता की सारी हदें पार करने के लिए उतावले जैसे दिखाई पड़ते हैं। आखिर इस अधिनायकवादी सोच और कार्यप्रणाली का समाधान क्या हो सकता है? नीति बचन द्वारा तो जनप्रतिनिधियों को सुधारा नहीं जा सकता है, क्योंकि वर्तमान चुनावी प्रक्रिया ऐसी है राजनीतिक पार्टियाँ प्रत्याशी बनने का सौभाग्य ऐसे लोगों को नहीं देती हैं जो साम-दाम-दण्ड-भेद की कार्य संस्कृति में विश्वास ना रखते हों। अतः उपरोक्त समस्या के निराकरण के लिए पीपुल्स मूवमेन्ट आॅफ इण्डिया (पी0एम0आई0) का यह स्पष्ट मानना है कि क्षेत्रविशेष की जनता के प्रति कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाये बिना सांसदों अथवा विधायकों की बेशर्मी और लूटतंत्र के इस दुष्चक्र को नहीं तोड़ा जा सकता है।