पीपुल्स मूवमेन्ट आॅफ इण्डिया (पी0एम0आई0) का प्रथम घोषणा-पत्र [Part 1] »

लोकसभा चुनाव 2019 तथा आगामी सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों हेतु पीपुल्स मूवमेन्ट आॅफ इण्डिया (पी0एम0आई0) का प्रथम घोषणा-पत्र भारत हजारों वर्षों तक राजतंत्रीय शासन के अमानवीय अन्याय और अत्याचारों के कारण मत्स्य न्याय का शिकार रहा है। लाखों कुर्बानियों के बाद ब्रिटिश राजतंत्र से 1947 में देश आजाद हुआ। आजादी के 68 साल बाद आज राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय पार्टियों तक में सुप्रीमो और हाइकमाण्ड नामक राजतंत्रीय दुर्गुणों से ग्रस्त अलोकतांत्रिक बुराई भारतीय राजनीति को पुनः अधिनायकवाद की तरफ ले जा रही है। लोकतंत्र के इस सर्वग्रासी दुर्गुण को भारत की जमीन से सदैव के लिए उखाड़ फेकने के लिए पी0एम0आई0 ने राष्ट्र के सामने एक फार्मूले को रखा है। इस फार्मूले के अनुसार सबसे पहले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के चयन की वर्तमान व्यक्तिकेन्द्रित पद्धति को विकेन्द्रित करने का विचार रखा है। वर्तमान समय में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के चयन में सांसदों और विधायकों के अभिमत लेने को या तो सुप्रीमो और हाइकमाण्ड जैसी संस्थाएं जरूरत नहीं समझती हैं अथवा औपचारिकता मात्र के लिए सांसदों और विधायकों की बैठक बुला ली जाती है। सुप्रीमो और हाइकमाण्ड जैसी अधिनायकवादी संस्थाएं भारतीय लोकतंत्र को अन्दर ही अन्दर रूग्ण कर रही हैं। अवांछित एवं मिट्टी की उर्वराशक्ति को सोख लेने वाले खर-पतवारों के कारण लहलहाती फसलें भी खराब हो जाती हैं। ठीक इसी तरह से अति व्यक्तिकेन्द्रित सुप्रीमो और हाइकमाण्ड जैसे अलोकतांत्रिक बुराइयांे ने भारतीय लोकतंत्र के विकास एवं खुशहाली, जिजीविषा एवं जीवनशक्ति को कुण्ठित और रूग्ण बना दिया है। आजादी के 68 साल बाद भी चाहे वह विधायिका के क्षेत्र में संस्थागत सुधार की समस्याएं रही हों या फिर न्यायपालिका, कार्यपालिका अथवा चुनाव सुधार इत्यादि के अत्यावश्यक मुद्दे रहे हों। भारतीय लोकतंत्र की इन समस्याओं पर सत्तापक्ष और विपक्ष प्रभावी पहल न करके केवल कुर्सी की लड़ाई एवं शुतुरमुर्गी चिन्तन में मसरूफ हैं। राजनीतिक पार्टियों की राष्ट्र की मौलिक समस्याओं के प्रति इस उदासीनता और तटस्थता के कारण समस्याएं दिन प्रतिदिन और भी विकराल रूप लेती जा रही हैं। एक तरफ जहाँ दलितों, आदिवासियों, अन्य पिछड़ा वर्गों तथा अल्पसंख्यक समुदायों की समस्याएं राष्ट्रीय चिन्तन का मुख्य विषय नहीं बन पा रही हैं। वहीं दूसरी तरफ किसानों और मजदूरों की समाजार्थिक स्थिति दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही हैं। भारत का अभावग्रस्त एवं तिरस्कृत वर्ग आज राजनेताओं के चुनावी शतरंज की मुहर एवं बुद्धिजीवी वर्ग के बौद्धिक जुगाली का विषय बनकर आत्महत्या करने के लिए अभिशप्त हो गया हो। भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना देखिए कि एक तरफ अमीरी और गरीबी के बीच खाईं विकराल रूप लेती जा रही है। वहीं दूसरी तरफ राजनीतिज्ञों और आम जनता के सरोकारों के विषय भी नितांत ही अलग-अलग होते जा रहे हैं। इसी का एक नमूना हमें चुनावों के दौरान दिखाई देता है। लोकसभा 2014 के चुनाव के लगभग 2 साल पहले से विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने खरबों रूपए नेताओं की इमेज विल्डिंग करने वाली संस्थाओं पर लुटा दिये थे। फिर विभिन्न संचार माध्यमों के द्वारा इमेज विल्डिंग करने वाली संस्थाओं द्वारा मसीहा बनाने का राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम सम्पन्न किया गया, जिसके दो दुष्परिणाम घटित हुए। पहला, नेताओं की ब्रान्डिंग और इमेज विल्डिंग इतनी खूबसूरती से की गई कि डेढ़-दो साल की ब्रान्डिंग के बाद ये नेता गरीबों की सभी समस्याओं के हर्ता तथा विधाता जैसे दिखने लगे। इसका जीता-जागता उदाहारण पहले लोकसभा चुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी की ब्रान्डिंग फिर इसके बाद दिल्ली के विधानसभा चुनाव 2015 के दौरान अरविन्द केजरीवाल द्वारा किये गये इमेज विल्डिंग और ब्रान्डिंग के एडवरटीजमेन्ट के कार्यक्रमों में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। दूसरा, भारतीय लोकतंत्र का नासूर बन गये कालाधन का राजनीतिक पार्टियों द्वारा इन चुनावों और प्रचार माध्यमों में अन्धाधुन्ध दुरूपयोग किया गया। परिणामस्वरूप अब सामान्य नागरिकों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं का चुनाव लड़ना सहज और सम्भव नहीं रह गया है। ऐसी परिस्थिति सामान्य नागरिकों के लिए तो बहुत ही निराशाजनक और चुनौतीपूर्ण है। लेकिन ऐसी परिस्थितियाँ राजनीतिक पार्टियों के सुप्रीमो और हाइकमाण्ड के लिए तो जैसे बरदान हों, क्योंकि चुनावी टिकट के आकांक्षी राजनीतिक पाटियों में सैकड़ो होते हैं लेकिन टिकट तो किसी एक को ही मिलता है। जिस किसी को यह चुनावी टिकट मिलता है उसको टिकट किसी व्यक्तिगत गुण के कारण नहीं मिलता है। बल्कि टिकट देने की राजनीतिक पार्टियों द्वारा अघोषित अनिवार्य (छिपी हुई) अर्हताएं हैं, जिसमें क्षेत्र विशेष में प्रत्याशी की जातिगत संख्या कितनी है? कितना ज्यादा बाहुबल और धनबल का चुनाव में दुरूपयोग कर सकता है? अथवा फिर अपने जाति के साथ अन्य जातियों के वोटों को कितना ज्यादा पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण करा सकता है? ऐसे व्यक्ति को टिकट का सबसे उपयुक्त प्रत्याशी माना जाता है। जो बुराइयाँ लोकतंत्र को कमजोर करती हैं उन बुराइयों को राजनीतिक पार्टियाँ प्रत्याशी की विशेषताएं मानती हैं। ये बुराइयाँ और दुर्गुण वोटर को असामाजिक और अवांछनीय ना लगें इसके लिए राजनीतिक पार्टियाँ आपस में मिलकर एक बहुत ही अच्छे शब्द का ‘आविष्कार’ कर डाली हैं इस शब्द को ये पार्टियाँ विनएविलिटी (चुनाव जीतने की योग्यता) का नाम देती हैं। इस शब्द के सबसे आधुनिक प्रणेता और समर्थक दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 के दौरान जब प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया चल रही थी उस समय आम आदमी पार्टी के तत्कालीन वरिष्ठ सदस्यों शान्ति भूषण, योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण ने चोर, बेइमान और क्रिमिनल को टिकट देने का जोर-शोर से विरोध किया था परिणाम यह हुआ कि सुचिता और ईमानदारी की साक्षात प्रतिमूर्ति होने का दावा करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने अपनी भ्रष्ट और बड़बोलेपन की शिकार कोटरी से मिलकर इन तीनों के साथ पार्टी के इन्टरनल लोकपाल (जिनके ईमानदारी की केजरीवाल ढोल पीटते रहते थे) एडमिरल रामदास को भी छल-प्रपंच और षड़यन्त्र द्वारा पार्टी से ही निष्कासित करा दिया। उस समय अरविन्द केजरीवाल ने अपने प्रत्याशियों को हीरा के समान बताया था। चुनाव जीतने के बाद अरविन्द के ये तथाकथित हीरे घटिया कांच से भी बद्तर निकल रहे हैं। चुनाव के पहले प्रत्याशी चयन का जो फार्मूला अरविन्द केजरीवाल भजन की तरह गा रहे थे कि सभी प्रत्याशियों का चुनाव 3ब् (कैरेक्टर, क्राइम, करप्सन) फार्मूले के तहत ही किया जायेगा। साथ ही बहुत जोर-शोर से मीडिया और भाषणों में उनके द्वारा दावा किया जा रहा था कि राष्ट्र के बहुत ही ईमानदार बुद्धिजीवी एडमिरल रामदास के अनुमोदन के बाद ही प्रत्याशियों का चयन किया जायेगा। बाद में एडमिरल रामदास की ईमानदारी के गुण से अरविन्द इतना डर गये कि एडमिरल रामदास को ही अधिनायकवादी ढंग से पार्टी से निष्कासित करा दिया। अरविन्द केजरीवाल के ईमानदारी और सुचितापूर्ण राजनीति के चुनावी भजन भारत के अन्य राजनीतिज्ञों के उपदेशों की ही तरह बकवास तथा जनता को बेवकूफ बनाने वाले ही सिद्ध हुए हैं। अरविन्द केजरीवाल का उदाहरण इस लेख में इसलिए दिया गया है क्योंकि इस व्यक्ति ने भारत की बदरंग हो चुकी राजनीति को बदलने का बढ-़चढ़कर दावा किया था और फिर हुआ क्या? यह व्यक्ति सफलता मिलने के बाद गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलने वाला सिद्ध हुआ है। जिन बुद्धिजीवियों के कंधों पर चढ़कर राजनीति की ।एठएब्एक्३ण्ण् सीखा था, मुख्यमंत्री बनने के बाद उन सभी के कद के सामने बौना दिखने के डर से राजनीति का यह नया मसीहा उन्हीं को षड़यन्त्रकारी बताकर पार्टी से निष्कासित करा दिया। भारत के समावेशी विकास का रास्ता व्यक्तिकेन्द्रित तो कतई नहीं हो सकता है। अब समय आ गया है कि राष्ट्र के विभिन्न वर्गों की समस्याओं के निराकरण के लिए व्यक्तिकेन्द्रित नहीं बल्कि जनकेन्द्रित अर्थात जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए के दर्शन को लेकर राजनीतिक आन्दोलन और क्रांति होनी चाहिए। भारतीय लोकतंत्र का नासूर बन गयी इन बुराइयों के युगान्तरकारी समाधान पीपुल्स मूवमेन्ट आॅफ इण्डिया (पी0एम0आई0) ने जनता के विचारार्थ रखा है। भारतीय लोकतंत्र मंें आजादी के बाद से लेकर आज तक चुनावों में पार्टियाँ मतदाताओं के सामने मुफ्त अथवा सस्ती उपभोक्ता वस्तुओं और सुविधाओं को देने की बढ़-चढ़कर घोषणा और कोरे दावे करती रही है। पी0एम0आई0 ने भारत में होने वाले भावी किसी भी चुनाव को लोकलुभावन लालीपाॅपों से हटाकर राष्ट्र नवनिर्माण के गम्भीर विमर्श में बदलने का एजेण्डा जनता के सामने रख रही है।