पीपुल्स मूवमेन्ट आॅफ इण्डिया (पी0एम0आई0) का प्रथम घोषणा-पत्र [Part 2] »

इस विकेन्द्रित विचार पद्धति के अनुसार प्रधानमंत्री, मुख्यमन्त्री और अन्य मन्त्रियों के पद राजनीतिक मठाधीशी के आधार पर नहीं बल्कि लोकसभा अथवा विधानसभा के चुनाव में प्राप्त वोटों के आधार पर होना चाहिए। इस वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक पद्धति के अनुसार सबसे पहले किसी भी सदन के आम चुनावों में सदन विशेष के सबसे अधिक वोट पाने वाले 10ः सांसद अथवा विधायक प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री पद के लिए प्रत्याशी बनें। इसके बाद प्रथम चक्र में इन 10ः सबसे अधिक वोट पाने वाले सांसदों अथवा विधायकों के लिए शेष सभी सांसद अथवा विधायक वोटिंग करें। अब प्रथम चक्र की वोटिंग के बाद सबसे अधिक सांसदों अथवा विधायकों का मत पाये 10ः सांसदों अथवा विधायकों के लिए दूसरे चक्र में पुनः वोटिंग हो। दूसरे चक्र की वोटिंग के बाद सबसे ज्यादा सांसदांें अथवा विधायकों के समर्थन प्राप्त व्यक्ति को प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया को त्रुटिरहित रखने के लिए एक भी सांसद अथवा विधायक को दोनों चरणों की वोटिंग सम्पन्न होने के पहले सदन के बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए नहीं तो जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र अथवा आर्थिक आधार पर सांसदों अथवा विधायकों के खरीद-फरोख्त और मैनुपुलेशन की सम्भावना बनी रहेगी। इस वैज्ञानिक फार्मूले के तहत यदि 16वीं लोकसभा के चुनाव के बाद केन्द्र में सरकार के गठन की बात की जाय तो जैसे बी0जे0पी0 ने 553 में से 282 सीट जीती है। ऐसी स्थिति में 282 के 10ः अर्थात बी0जे0पी0 के 28 सबसे ज्यादा मत पाने वाले सांसदों को प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशिता के लिए खड़े होना चाहिए। इसके बाद प्रथम चक्र में 28 सांसदों के लिए शेष 254 सांसद वोट करें। प्रथम चक्र की वोटिंग के बाद जिन सांसदों को 28 का 10ः अर्थात 3 सांसदों (चूँकि व्यक्ति के रूप में 2.8 की गिनती निरर्थक है इसलिए सबसे नजदीक संख्या 3 ही आती है) के लिए सभा स्थगित किये बिना और सांसदों को सभा से बाहर जाकर वोटर को मैनूपुलेट करने का अवसर दिये बिना उसी बैठक में प्रथम चक्र की वोटिंग में सबसे ज्यादा मत पाये इन 3 सांसदों के लिए पुनः दूसरे चक्र में बी0जे0पी0 के 279 सांसदों को वोट करना चाहिए। अब इन 3 सांसदों में से दूसरे चक्र की वोटिंग के बाद जिस किसी सांसद को सबसे ज्यादा सांसदों का समर्थन मिले उस सांसद को प्रधानमंत्री बनना चाहिए। इसी वैज्ञानिक फार्मूले के तहत भारत के सभी प्रदेशों में सरकारों का गठन किया जा सकता है। उपरोक्त प्रक्रिया भारत की राजनीति में आमूल-चूल परिवर्तन करने वाली है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्तिकेन्द्रित सुप्रीमो एवं हाइकमाण्ड नामक सर्वग्रासी रोग भारत के राजनीतिक पटल से हमेशा के लिए तिरोहित हो जायेंगे। इस वैज्ञानिक फार्मूले से भारत की राजनीति में निम्नलिखित बदलाव तुरन्त दृष्टिगोचर होंगे- (1) इस नई प्रक्रिया से सभी सांसद और विधायक अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों के अधिक से अधिक जातियों एवं सामाजिक वर्गों से वोट पाने की लालसा में जुड़ने का प्रयास करेंगे क्योंकि उपरोक्त प्रक्रिया के द्वारा एक-दो जातियों के धु्रवीकरण से सांसद और विधायक बनने के बजाय अधिक से अधिक जातियों और वर्गों के वोटरों के मत पाने की स्वस्थ परम्परा की शुरूआत हो जायेगी। (2) चुनावों में अपराधी और भ्रष्ट प्रवृत्ति के लोग भारतीय लोकतंत्र की मर्यादा को धनबल और बाहुबल के बल पर खण्डित नहीं कर पायेंगे। प्रत्याशियों के लिए जनप्रिय बनना सांसद और विधायक बनने की प्राथमिक और एक मात्र कसौटी बन जायेगी। (3) वर्तमान समय में एन-केन-प्रकारेण एक-दो जातियों और वर्गों के वोट पाकर चुनाव जीतने के स्थान पर अधिकतम लोगों के वोट पाने की लालसा प्रस्फुटित होगी। (4) यदि उपरोक्त फार्मूले को भारत की जनता ने अपनी सहमति दे दी तो न केवल महात्वाकांक्षा के भूँखे व्यक्तिकेन्द्रित सुप्रीमो नामक मसीहा राजनीतिक फलक से हमेशा के लिए विलुप्त हो जायेंगे बल्कि इस प्रक्रिया के द्वारा परिवारवाद, सम्प्रदायवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति भी हमेशा के लिए जमींदोज हो जायेगी। (5) चुनावों में राजनीतिज्ञों द्वारा जाति और सम्प्रदाय के आधार पर वोटों के धु्रवीकरण की कुचेष्टा भी हमेशा के लिए भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक हो जायेगी। उपरोक्त वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ यदि निर्वाचन क्षेत्र विशेष के लोगों से राजनीतिक पार्टियाँ एवं प्रत्याशी अपने कार्यक्रमों, विचारधारा तथा व्यक्तित्व के आधार पर चन्दा इकट्ठा करें तो चुनावों को कालेधन के बल पर प्रभावित करने की दुष्प्रवृत्ति खत्म हो जायेगी। निर्वाचन क्षेत्र विशेष के लोगों से चन्दे के रूप में आर्थिक सहयोग द्वारा प्रत्याशियों के लिए चुनाव लड़ने को अनिवार्य बनाया जाय तो प्रत्याशी सांसद और विधायक बनने के बाद सुप्रीमो और हाइकमाण्ड के द्वारा चुनाव के समय बहाई जाने वाली ब्लैकमनी के एहसान से मुक्त होकर अपने विवेकानुसार निर्वाचन क्षेत्रों में काम करने लगेंगे। यदि प्रत्याशी गाॅव-मोहल्लों में प्रचार-प्रसार द्वारा वोट ले सकते हैं तो फिर प्रत्याशी अपने अच्छे व्यक्तित्व, कार्यक्रमों एवं विचारधारा के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र के निवासियों से ही चन्दे के रूप में चुनाव खर्च क्यों नहीं ले सकते हैं? इससे वोटर और प्रत्याशी के बीच में भावनात्मक एवं नैतिक सम्बन्ध विकसित होगा। बौद्धिक रूप से दिवालिया राजनीतिक चिंतक चुनावी खर्च को अधिक से अधिक बढ़ाने अथवा चुनावों में सरकारी फण्डिंग करने का जोर-शोर से समर्थन करते हैं। ऐसे तथाकथित राजनीतिक चिंतकों को यह समझना चाहिए कि ऐसे ही अतार्किक प्रयासों एवं स्थापनाओं का यह परिणाम है कि नेताओं एवं जनता के सरोकार विपरीत ध्रुओं के समान दूर हो गये हैं। नेता मसीहा बन गये और आम जनता याचक। चुनावो में कालाधान के अन्धाधुंध इस्तेमाल और जनता को अतार्किक एवं झूंठे वादों से कनफ्यूज करके जब प्रत्याशियों को वोट पाने का विश्वास हो तो फिर ‘चुनावी सीजन’ के अलावा ये माननीय जनता के सरोकारों के प्रति क्यों संवेदनशील बनेंगे? अतः चुनावों के लिए आदर्श स्थिति तो यह होती कि राजनीतिक पार्टियों के द्वारा चुनाव लड़ने के आकांक्षियों के बीच लाटरी प्रणाली से टिकट का वितरण होता तथा सम्बन्धित लोकसभा अथवा विधान सभा क्षेत्र की आम जनता से ही ये प्रत्याशी अपने व्यक्तित्व और घोषणा पत्रांें के आधार पर चुनावी चन्दा इकट्ठा करते। इसका परिणाम यह होता कि चुनावी चन्दा लेने वाले और देने वाले दोनों के बीच एक तरह का संवाद स्थापित होता तथा वैचारिक प्रतिबद्धता का भी एक स्तर विकसित होता। दूसरा सुप्रीमो और हाईकमाण्ड तमाम भ्रष्ट तरीके से इकट्ठा किये गये काले धन को चुनावों में अन्धाधुंध खर्च करके आम जनता की समस्याओं को न तो इग्नोर कर पाते और ना ही मजबूरियों का मजाक उड़ा पाते। पूर्व मध्यकालीन चोल साम्राज्य में स्थानीय निकायों में प्रचलित लाटरी प्रणाली के माध्यम से उर (उर सामान्य लोगों की समिति होती थी) अथवा महासभा (ब्राम्हणों की सभा थी) का अध्यक्ष का चुनाव किया जाता था। अतः ऐसी निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया वर्तमान समय में क्या नहीं अपनायी जा सकती है? वर्तमान समय में आलंम्पिक खेल से लेकर लगभग प्रत्येक खेल में पारी प्रारम्भ करने के लिए टाॅस किया जाता है। यह भी एक तरह की लाटरी प्रणाली के द्वारा ही है। यदि लाटरी प्रणाली के द्वारा राजनीतिक पार्टियाँ हर स्तर के चुनाव में टिकट का वितरण करने लगें तो इससे कार्यकर्ताओं की गरिमा को स्थापित किया जा सकता है। लाटरी प्रणाली के द्वारा टिकट वितरण से भारतीय राजनीति में निम्नलिखित अन्य क्रांतिकारी परिवर्तन घटित होंगे- (1) वोट बैंक की राजनति भारत से खत्म हो जायेगी। भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में प्रत्याशी एवं वोटर दोनों की गरिमा पुनः स्थापित होगी। (2) जातिवादी राजनीति धीरे-धीरे समाप्त हो जोयेगी, क्योंकि कार्यकर्ता किसी भी जाति का हो लेकिन लाटरी जिसकी निकलेगी इस प्रक्रिया से वही प्रत्याशी बनेगा। इस परिस्थिति में राजनीतिक पार्टियाँ अपने विचारों, कार्यक्रमों और प्रत्याशी के व्यक्तित्व के आधार पर चुनाव लड़ेगी। राजननितिज्ञों का दर्शन अधिक से अधिक व्यक्तियांें, जातियों और वर्गों का हित हो जायेगा ना कि कुछ जातियों का हित। इस प्रक्रिया से समाज में सामाजिक समरसता फैलेगी। (3) राजनीतिक पार्टियाँ व्यक्तिकेन्द्रित राजनीति न करके इशू बेस्ड राजनीति करेंगी। (4) राजनीतिक पार्टियों के टिकट सुप्रीमो बेचने का दुस्साहस नहीं कर पायेंगे। (5) सुप्रीमो जैसी अवांछित संस्था भारतीय राजनीति से खत्म हो जायेगी। (6) राजनीति फुल टाइमर प्रोफेशन न होकर देश सेवा एवं समाज सेवा का रूप होगी। (7) आज सुप्रीमों की कुटिलता के कारण गावों तक में सामाजिक और राजनीतिक वैमनस्य चरम पर पहुँच चुका है। लाटरी प्रणाली द्वारा टिकट वितरण से इस समस्या से हमेशा के लिए निजात मिल जायेगी। (8) आज सुप्रीमो जैसे राजनीतिक मठाधीशी का अस्तित्व को पुष्पित और पल्लवित करने में नेता, अधिकारी, ठेकेदार और माफिया का गठजोड़ सबसे बड़ा कारक है। यही ठेकेदार और माफिया राजनीतिक मठाधीशों के गलत कामों को करते हैं और अपने राजनीतिक आका को हर तरह के छल-प्रपंच द्वारा लाभ पहुँचाकर खुश करते रहते हैं। प्रतिफल के रूप में राजनीतिज्ञ इन असामाजिक तत्वों को हर तरह से संरक्षण प्रदान करते हैं। चुनाव जिताने में यही असामाजिक तत्व विभिन्न जातियों में फैले वोट के दलालों को मैनेज करते हैं। लाटरी द्वारा टिकट वितरण में राजनीतिक मठाधीशों के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा। अतः ठेकेदार और माफिया जिस तरह से काली कमाई का दुरूपयोग करके पूरी चुनावी व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, उसका हमेशा के लिए उन्मूलन हो जायेगा। इस स्थिति में राजनीतिक पार्टियों और प्रत्याशियों के लिए चुनाव जीतने का एकमात्र आधार विचारधारा, कार्यक्रम और व्यक्तित्व ही होगा। (9) चुनाव में पैसे की भूमिका घटेगी और राजनीति में वैचारिक मूवमेन्ट पुनः स्थापित होंगे। यदि उपरोक्त वैज्ञानिक व्यवस्था को भारतीय राजनीति में लागू किया जाय तो प्रत्याशी आम जनता के सरोकारों से बेरूखी करने से 100 बार सोचेंगे। अतः आज आम जनता को यह सोचना होगा कि राजनीतिज्ञों के झूँठे एवं अतार्किक घोषणाओं एवं विज्ञापनों के कारण विधायिकाएं करोड़पतियों और अरबपतियों से भरी हुई ‘हाऊस आफ लार्ड’ कैसे बन गयी हैं? चुनावों के समय धनबल का अत्यधिक दुरूपयोग विमर्श निर्माण का मुख्य साधन बन गया है। राजनीति की इस कुरीति को यथाशीघ्र बदलना होगा, नहीं तो भारतीय लोकतंत्र की जिजीविषा ही खत्म हो जायेगी।